आज बैठे बैठे कुछ याद आया और काफी प्रासंगिक भी लगा तो सोचा कि आप सब को बताऊँ. कुछ साल पहले मैं एक बच्चे को विज्ञान पढ़ाने में मदद कर रहा था और उसे मैंने गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत के सन्दर्भ में समझाते हुए कहा "जब वैज्ञानिक न्यूटन ने पेड़ से सेब को नीचे गिरते देखा तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ और उसने गुरुत्वाकर्षण की खोज की." इतना कहते ही मेरे कानो में जो सुनाई दिया उसने मेरी तन्मयता को भंग कर दिया. किसी ने कहा "ईमे आस्चर्ज का कोन बात है जी. आ ई कोन बैगानिक है जिसको आस्चर्ज होता है जब गाछ से सेब निच्चे गिरता है. आस्चार्ज त तब न होना चाहिए जब ऊ गिरने के बाद उप्पर भाग जाय{1}" आपका अनुमान सही है अगर आप सोच रहे हैं कि ये वाक्य रामोदर के कंठ से निकले हैं. किताब ना पढ़ा जाय तो आदमी अपने अंतर्ज्ञान या यूं कहें कि सहज-ज्ञान के हिसाब से सोचता है और वही रामोदार ने किया भी. मैंने मुस्कुराते हुए रामोदार से कहा कि ऐसा होता है कि धरती सारी चीज़ों को गुरुत्व बल से अपनी ओर खींच के रखती है. अगर ऐसा ना हो तो चीज़े जमीन पे टिकी नहीं रह सकती. यूं तो मैंने अंतिम पंक्ति मैंने ऐसे ही समझाने के लिए कह दी थी लेकिन उसके उत्तर में जो रामोदार ने कहा उसे सुनकर आप भी स्तब्ध होकर सोच में पड़ जायेंगे जैसा कि मेरे साथ हुआ. उसने कहा "ओ!!!!!!! माने जब आदमी बडका अफसर बन जाता है चाहे बड़ा काबिल हो जाता है त उसका गुरत्ता बल कम हो जाता है अही लेके ऊ जो है जमीन पर नै टिकता है आ उरने लगता है{2}" पड़ गए ना सोच में. बात है ही सोचने वाली.
सफलता से आदमी में अहंकार नहीं आना चाहिए नहीं तो वो अपने जमीन पे टिके रहने की शक्ति खो देता है और उड़ने लगता है. इस तरह की क्षद्म-ऊर्जा युक्त उडती हुई चीज का गिरना तय है और समझने वाली बात है कि ज्यादा ऊंचाई से गिरने का अघात भी ज्यादा होता है. वसे तो सभी को चाहिए कि वो खुद को अहंकार से बचाए रखे लेकिन सफल आदमी के लिए ये ज्यादा जरूरी हो जाता. सफल व्यक्ति अगर विनम्र ना हो तो उससे दूर रहने की सलाह दी गयी है. "दुर्जनः परिहर्तव्यो विद्या अलंकृतोपिशं, मणिना भूषित सर्पः किमसौ ना भयंकरः" विनम्रता का आभाव किस हद तक घातक हो सकता है उसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि अवतारी पुरुष भी अविनाम्रता के दुष्परिणामों से नहीं बच पाए. ऐसा परशुराम अवतार की कथा में दृष्टिगोचर होता है. अपने क्रोध (या अविनाम्रता) के कारण भगवान परशुराम, जो कि स्वयं विष्णु के अवतार हैं, कभी भी जन-नायक नहीं हो पाए और यही परशुराम अवतार को रामावतार से भिन्न बनाता है. इसलिए सफल व्यक्ति को विनम्र होना चाहिए.
इन सारी चर्चाओं से परे होकर अगर सोचें तो ध्यान एक नए नियम की तरफ जाता है और उसे मैंने नाम दिया है रामोदार का गुरुत्वाकर्षण नियम: "सफलता के कारण गुरुत्वाकर्षण बल में कमी आती है और आदमी उड़ने लगता है." इस नियम के जितनी ज्यादा अपवाद मिलें समाज के लिए उतना ही अच्छा.
*************************************************************
1 इसमें आश्चर्य की कौन सी बात है. और ये कौन सा वैज्ञानिक है जिसे आश्चर्य होता है जब पेड़ से सेब नीचे गिरता है. आश्चर्य तो तब होना चाहिए जब वो गिरने के बाद ऊपर भाग जाय.
2 माने: मतलब
गुरत्ता: गुरुत्व
अही लेके: इसी कारण से
नै: नहीं
उरने: उड़
जो सोए है उन्हें जगाते हैं हम अपने छंदों से. हम पिघलाते लौह-बेड़ियाँ कुछ स्याही की बूंदों से...
Showing posts with label गद्य. Show all posts
Showing posts with label गद्य. Show all posts
Wednesday, September 7, 2011
Thursday, November 25, 2010
समय की गणना का दृष्टिकोण: समय और संख्या
समय की गणना का दृष्टिकोण: समय और संख्या
बहुत दिनों से रामोदार (click here to know more about Raamodaar) की कोई खबर नहीं मिली और ना ही उसे देखा तो अचानक ध्यान हो आया की ना जाने कहाँ गायब हो गया. मुझे डर लगा की कहीं कोई अनिष्ट ना हो गया हो उसके साथ. असल बात ये है की मैं भी उसकी बातों का आदि हो गया हूँ. कभी कभी मैं ये सोचता हूँ की किसी भी परिस्थिति में उसके विचार अजीब होते हैं (जैसा की आप जानते हैं). इतनी बाल-सुलभ बातें बहुत कम सुनने में आती हैं सो मन हल्का करने के विचार से मैं उसके घर, धाँगड़-टोली की तरफ चला गया. मुझे उसके घर की ओर जाते हुए देखकर लोगो ने ऐसी प्रतिक्रिया दी जैसे मैं कोई इंसान नहीं बल्की किसी और ग्रह का प्राणी हूँ. खैर छोडिये ये सब. मेरी पहली दृष्टि जब उसपर पड़ी तो पाया की वो अपने गाय के बछड़े के बदन से जूएँ निकाल रहा था और साथ ही गाना गा रहा था...."कोएल बीनू बघिया...ना सोहे राजा (१)..... ". मुझे देखते ही प्रसन्नता और विष्मय से भरे चेहरे से मुझे पूछा...."अरे बाप रे....एतना दिन के बाद सूझे* आप. एक ठो बात कहते हैं आप तो पिछला कुछ दिन में मोटा गिये है हजूर."... इतना बोलते ही ठठाकर हँस पड़ा लेकिन अगले ही पल संभल कर बोला "लेकिन आप काहे ला इधर आये कोनो काम था त हमको बोला लेते नs".
मैंने उसे सहज होने को कहा और बात को बदलते हुए पूछा, "का भई अपना लेरुआ * (बछडा) से का बात कर रहे थे?"
"का जो बात करेंगे हजूर...हम तो इहे कह रहे थे की रे लेरुआ तू तो बीसे साल में अपना जिनगी पूरा लेता है..हम लोगन के तो ढेर जीना परता है..ओकरा में भी राम राम का नाम लेवे के टैम * नई मिलता है". इतना बोलते ही उसने सवाल दागा अपने रामोदार स्टाइल में....
"अच्छा हजूर एगो बात बताइये त कि जो हम जलमते * ही राम राम जपना चालू करें त कै बेर राम राम हो जाए पूरा जिनगी * भर में?"
विज्ञान से सम्बंधित रहने के करान शायद ही ऐसा कोई दिन होता होगा जब कोई छोटी या बड़ी गणना ना करता होऊ. लेकिन कभी ऐसी गणना नहीं की थी जैसी रामोदार ने कही. सोच ही रहा था की उत्तर देने की शुरुआत कैसे करू कि देखा रामोदार बड़े तेज़ी से अपने बछड़े के पीछे भगा. शायद रस्सी ढीली रह गयी थी और बछड़े ने अपने स्वातंत्र्य का पूरा लाभ उठाया और भाग खड़ा हुआ...दोनों की दौड़ देखता हुआ भी मैं उस गिनती के बारे में ही सोच रहा था. और जल्दी में गिनती कर डाली. निष्कर्ष कुछ रोमांचक और चिंतित करनेवाला था.
देखा जाये तो एक साल में कुल ३ करोड़, १५ लाख और छत्तीस हज़ार सेकंड होते हैं. सुविधा के लिए इसे ३ करोड़ मान लिया जाए. और अगर हम हर सेकंड ३ बार भी राम का नाम ले तो साल भर में ९ करोड़ और १०० साल में ९०० करोड़ बार बस. इस बात से ना जाने क्यों अपनी जिन्दगी बहुत छोटी लगने लगी थी. समय कि इतनी छोटी इकाई से भय सा होने लगा था. लगा कि ये महत्तम संख्या का दसवा हिस्सा भी हम इस्तेमाल नहीं करते. ज्यादातर समय तो लोग निंदा, झगडा और सोने में बिता देते हैं.
अचानक एक बात और कौंधी जो और भी झकझोरनेवाली थी.
एक नज़र डाले अगर 2G घोटाले में लिप्त रकम पर (१ लाख ७० हज़ार करोड़) तो पाते हैं कि अगर कोई हर सेकेण्ड १ रुपया कमाए तो इतनी रकम कमाने में उसे ६०,००० साल लगेंगे. या यू कहें कि ६०,००० साल में जितनी बार आप राम का नाम नहीं ले सकते उतनी रकम डकारते मिनट भी नहीं लगे इन लोगो को. आपको आसानी के लिए बता दूं कि हर सेकंड १ रुपया के हिसाब से ताउम्र ३ करोड़ रूपये बने अगर तो इसका मतलब है कि ३० साल की नौकरी में १ लाख रूपये प्रतिमाह जो कि महत्तम रकम हो सकती है एक इमानदार आम आदमी के लिए.
देश के कर आदमी की जेब से औसतन १७,००० रूपये लील गया यक प्रकरण. यह कितने ही घोटालों का महाघोटाला है.
और इसके बाद अंत क्या....."इस्तीफा". "पद का त्याग" करके "त्याग के पद" पे आसीन हो जाना कोई इनसे सीखे.
मैं अभी भी उसी संख्याओं के चक्कर में लगा था कि रामोदार ने आवाज़ लगाई "बोलिए न का हुआ..?" मगर मैं कुछ बोल नहीं पाया....एक बार फिर रामोदार ने कुछ सोचने को मजबूर किया था...
reference
१. शारदा सिन्हा द्वारा गाया हुआ एक भोजपुरी लोक-गीत.
*सूझे: दिखे हैं
टैम: टाइम
लेरुआ: गाय का बछडा.
जलमते: पैदा होते ही.
जिनगी: जिन्दगी.
राजेश कुमार "नचिकेता"
Saturday, August 28, 2010
फांसी कि फांस में फंसी सरकार!!!!!!!!!!
अपने पांच साल के बच्चे, फोचला, को कंधे पे बिठा के रामोदार मस्ती में कोई चैता गता हुआ चला आ रहा था. आते ही मुझे दो भुट्टे दिए और अपने चिरपरिचित अंदाज़ में कहा "जै हो!!!"
"का हो रामोदार क्या समाचार है आज?" मैंने अभिवादन स्वीकार करते हुए यू ही पूछ लिया? मेरा ये प्रश्न सुनकर वो बालक कि तरह खिलखिलाकर ऐसे हँसा मानो कह रहा हो "क्या मूर्ख आदमी है, अखबार खुद पढ़ रहा है और समाचार मुझसे पूछ रहा है." मगर बोला "हजूर हम कोन समाचार देंगे आपको पेपर तो आप अपने पढ़ रहे हैं आपे बताइए न कि का छापा है औ ई छौरा और ई दाढ़ीवाला के है केकरा फोटो है". उसने अजमल कसाब और अफजल गुरु कि तस्वीरों कि तरफ इशारा करते हुए पूछा. मैंने सवाल को ज्यादा गंभीरता से ना लेते हुए कहा "इन दोनों को कचहरी से फांसी कि सजा हुई है और सरकार इन्हें फांसी देने के बारे में विचार कर रही है." फांसी में मिल रही देरी कि बात सुनकर खुश हो गया और सरकार कि प्रशंसा करता हुआ बोला. "का बात है! केतना अच्छा सरकार है जो फांसी देवे से पहले एतना बार सोचता है. लगता है सच्चे में सुराज (पाठक स्वराज पढ़े) आ गिया है. ऐसा सरकार पैहले होता त भगत सिंघ लोगवन को फांसी नई न होता हजूर. लेकिन हम जाते हैं कही देर से गिये न त ई फोचला का माय हमको फांसी दे देगा."
उसकी इस बात को उसका भोलापन कहूं, या घटनाक्रम की अनभिज्ञता या कुछ और मगर उसने मेरे अंतर्मन को हिला दिया. मेरे मानसपटल पे अनमने ढंग से सुनाई गयी खबर के बदले एक बहुत ही विस्तृत और व्यापक सा प्रश्न कौंध गया. सवाल ये था की दुर्दांत आतंकी होने के बावजूद ये अब तक फांसी के फंदे से दूर है और ना जाने कितने दिन और दूर रहेंगे. साथ ही ना चाहते हुए रामोदार ने जो तुलनात्मक टिपण्णी भगत सिंह के बारे में की वो भी विस्मृत करने लायक नहीं थी. जब भगत सिंह को फांसी की सजा हुई थी तब चाहते तो गांधीजी या तब की कांग्रेस उन्हें बचा सकती थी. मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया शायद इसलिए की वो उग्रवाद और हिंसा के पक्षधर थे भले ही वो राष्ट्र के लिए ही क्यों ना किया गया हो. मगर अभी क्या हो रहा है? कसाब और अफजल गुरु ने तो राष्ट्रद्रोह किया है. फिर भी फांसी नहीं. जिस कांग्रेस ने शक्ति होने के बावजूद भगत सिंह को नहीं बचाया उसी कांग्रेस की सरकार को इन दोनो को फांसी देने में इतनी समस्या क्यों हो रही है. क्या ये इच्छा-शक्ति की कमी है या कुछ और. ये दोनों तो शास्त्र (नीचे व्याख्या देखे*) के हिसाब से आततायी की श्रेणी में आते हैं. जिसका वध सुनिश्चित करना राजा का काम है. क्या अपने राजा में प्रजा के हित कि रक्षा करने का सामर्थ्य है?
कई कोस लम्बे बायोडाटा के स्वामी होने के बावजूद अपने प्रधानमंत्री में आतंरिक और बाहरी सुरक्षा के प्रति उदासीनता उनकी उपलब्धि को खराब करती है. लोग कहते हैं उनकी अपनी राजनैतिक विवशता है. वो राजनितिक विवशता ही क्या जो प्रजा-हित के काम करने में बाधक हो.
ईश्वर हम सब कि रक्षा करे. ॐ शान्ति शान्ति शान्ति
---नचिकेता २८ अगस्त २०१०.
*(जो किसी के घर में आग लगावे, किसी को विष दे कर उसकी हत्या करे, स्त्रियों और बालको को अकारण कष्ट पहुचाये वो आततायी कहलाते हैं और राजा का कर्त्तव्य है कि ऐसा करना प्रजा को वीभत्स लगने के बावजूद उसका वध शीघ्र करे यही राष्ट्र और प्रजा के हित में है.)
"का हो रामोदार क्या समाचार है आज?" मैंने अभिवादन स्वीकार करते हुए यू ही पूछ लिया? मेरा ये प्रश्न सुनकर वो बालक कि तरह खिलखिलाकर ऐसे हँसा मानो कह रहा हो "क्या मूर्ख आदमी है, अखबार खुद पढ़ रहा है और समाचार मुझसे पूछ रहा है." मगर बोला "हजूर हम कोन समाचार देंगे आपको पेपर तो आप अपने पढ़ रहे हैं आपे बताइए न कि का छापा है औ ई छौरा और ई दाढ़ीवाला के है केकरा फोटो है". उसने अजमल कसाब और अफजल गुरु कि तस्वीरों कि तरफ इशारा करते हुए पूछा. मैंने सवाल को ज्यादा गंभीरता से ना लेते हुए कहा "इन दोनों को कचहरी से फांसी कि सजा हुई है और सरकार इन्हें फांसी देने के बारे में विचार कर रही है." फांसी में मिल रही देरी कि बात सुनकर खुश हो गया और सरकार कि प्रशंसा करता हुआ बोला. "का बात है! केतना अच्छा सरकार है जो फांसी देवे से पहले एतना बार सोचता है. लगता है सच्चे में सुराज (पाठक स्वराज पढ़े) आ गिया है. ऐसा सरकार पैहले होता त भगत सिंघ लोगवन को फांसी नई न होता हजूर. लेकिन हम जाते हैं कही देर से गिये न त ई फोचला का माय हमको फांसी दे देगा."
उसकी इस बात को उसका भोलापन कहूं, या घटनाक्रम की अनभिज्ञता या कुछ और मगर उसने मेरे अंतर्मन को हिला दिया. मेरे मानसपटल पे अनमने ढंग से सुनाई गयी खबर के बदले एक बहुत ही विस्तृत और व्यापक सा प्रश्न कौंध गया. सवाल ये था की दुर्दांत आतंकी होने के बावजूद ये अब तक फांसी के फंदे से दूर है और ना जाने कितने दिन और दूर रहेंगे. साथ ही ना चाहते हुए रामोदार ने जो तुलनात्मक टिपण्णी भगत सिंह के बारे में की वो भी विस्मृत करने लायक नहीं थी. जब भगत सिंह को फांसी की सजा हुई थी तब चाहते तो गांधीजी या तब की कांग्रेस उन्हें बचा सकती थी. मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया शायद इसलिए की वो उग्रवाद और हिंसा के पक्षधर थे भले ही वो राष्ट्र के लिए ही क्यों ना किया गया हो. मगर अभी क्या हो रहा है? कसाब और अफजल गुरु ने तो राष्ट्रद्रोह किया है. फिर भी फांसी नहीं. जिस कांग्रेस ने शक्ति होने के बावजूद भगत सिंह को नहीं बचाया उसी कांग्रेस की सरकार को इन दोनो को फांसी देने में इतनी समस्या क्यों हो रही है. क्या ये इच्छा-शक्ति की कमी है या कुछ और. ये दोनों तो शास्त्र (नीचे व्याख्या देखे*) के हिसाब से आततायी की श्रेणी में आते हैं. जिसका वध सुनिश्चित करना राजा का काम है. क्या अपने राजा में प्रजा के हित कि रक्षा करने का सामर्थ्य है?
कई कोस लम्बे बायोडाटा के स्वामी होने के बावजूद अपने प्रधानमंत्री में आतंरिक और बाहरी सुरक्षा के प्रति उदासीनता उनकी उपलब्धि को खराब करती है. लोग कहते हैं उनकी अपनी राजनैतिक विवशता है. वो राजनितिक विवशता ही क्या जो प्रजा-हित के काम करने में बाधक हो.
ईश्वर हम सब कि रक्षा करे. ॐ शान्ति शान्ति शान्ति
---नचिकेता २८ अगस्त २०१०.
*(जो किसी के घर में आग लगावे, किसी को विष दे कर उसकी हत्या करे, स्त्रियों और बालको को अकारण कष्ट पहुचाये वो आततायी कहलाते हैं और राजा का कर्त्तव्य है कि ऐसा करना प्रजा को वीभत्स लगने के बावजूद उसका वध शीघ्र करे यही राष्ट्र और प्रजा के हित में है.)
Friday, July 2, 2010
रामोदार
आगे की पोस्ट लिखने से पहले मैं अपने एक किरदार से आपका परिचय करा दूं. नाम तो उसका कुछ भी हो सकता है पर मैंने नाम रखा है "रामोदार". रामोदार ही क्यों फिर कभी बताऊँगा. पहले परिचय करा दूं. रामोदार अपने अब तक के जीवन में बस एक बार स्कूल गया था जब भागलपुर जिले के खरीक गाँव का मध्य विद्यालय उसके गाँव के लोगो के लिए बाढ़ की विभीषिका से बचने की शरणस्थली बना था. उसके अलावा कभी गाय भैंस चराने भी स्कूल जाना नहीं हुआ पढ़ाई करने का तो सोचना ही क्या. देखने में वो प्रेमचंद के हल्कू जैसा या फिर झूरी जैसा होगा ऐसा मान सकते हैं. बोलने का अंदाज़ बिलकुल ठेठ मगर आत्मविश्वास और शाहस से भरा हुआ क्योकि अपने देश में गरीब में आत्मविश्वास का होना अपने आप में बहुत बड़े शाहस की बात है. जो कपडे वो पहनता था वो इतने मलिन होते थे की कोई यकीन नहीं कर सकता की कभी वो नए भी रहे होंगे. कपडे वो कभी साफ़ नहीं करता था क्योकि उसकी आस्था थी की कपडे तब तक "नए" बने रहते हैं जब तक धुले ना जाए. यह पूछने पर की वो कपड़ो को कभी साफ़ क्यों नहीं करता बड़े ही सादगी से कहता था "कपड़ा धोने से पुरना हो जाता है इसलिए हम धोयबे नै करते हैं". कपडे को नित्य नवीन रखने का यह नूतन प्रयोग मुझे अद्भुत लगा. रामोदार ने कभी किसी भी काम के लिए किसी को मना नहीं किया होगा. उसके जीवन में कितनी परेशानिया थी इस बात से पता चलता है की वह ११ बच्चो का पिता था जिसमे से ६ जीवित हैं. बावजूद इसके उसके चेहरे से मुस्कराहट कभी हटती नहीं थी. इतनी निर्धनता में भी हसने वाले उस जीवट को देखकर सही में यकीन करना पड़ता था की मनुष्य ही ईश्वर की बनाई हुई सर्वोत्तम रचना है. उसका तकिया-कलाम था "बाकी ठिक्के है!!!". मुझे उससे एक बार की बात याद आती है जो आपको बताना चाहूँगा. एक बार दूर से उसे देखा तो उसका चेहरा कुछ रुआंसा सा लगा मगर जैसे मैंने नाम ले कर पुकारा तो वही साश्वत मुसकुराह लिए उत्तर आया "जै हो". मैंने पूछा: "क्या हाल है हो रामोदार? बोला "ऊ हमरी छौ मैहना का गाभिन गैया को कुतवा काट लिया था ना उसी को असाम रोठ पर फेकने गिये थे. बाकी ठिक्के है." यहाँ आपको ये बताना जरूरी समझता हूँ कि अपनी गाय के मरने पर सहजता का भाव उसकी अपने पशु के प्रति उदासीनता के कारण नहीं बल्कि उसकी सहनशीलता के कारण था. इतने अभाव के बीच भी प्रसन्न रहना वो जानता था.
यह किरदार हम सब को काफी कुछ सिखाएगा और जीवन के प्रति हमारी आस्था को प्रगाढ़ करेगा ऐसी उम्मीद करता हूँ. हर हफ्ते इस किरदार को केंद्र में रखकर कुछ समकालीन समस्याओ पर व्यंग्य लिखने कि कोशिश करूंगा. आपका प्यार चाहूँगा.
-नचिकेता
यह किरदार हम सब को काफी कुछ सिखाएगा और जीवन के प्रति हमारी आस्था को प्रगाढ़ करेगा ऐसी उम्मीद करता हूँ. हर हफ्ते इस किरदार को केंद्र में रखकर कुछ समकालीन समस्याओ पर व्यंग्य लिखने कि कोशिश करूंगा. आपका प्यार चाहूँगा.
-नचिकेता
Subscribe to:
Posts (Atom)