Friday, June 6, 2014

ये चाँद

कभी ये दिल खुद ही खुद पे सबर रखता है 
सुना है खुदा भी तो सब की खबर रखता है 
तुम ही कहो कैसे अकेले में तुमको प्यार करूँ 
ये चाँद भी सोता कहाँ है बस मुझी पे नज़र रखता है 1 

तुम्हे साँप के काटे का मन्तर मालूम है तो उसके क्या 
ये इश्क़ है इश्क़ जो उतर जाए तब भी असर रखता है  2 

क्यों बिच्छुओं को बदनाम करते हो खामखाह 
ये मोहब्बत का हकीम है, दवा की शीशी में जहर रखता है 3 

Friday, April 25, 2014

मेरा वोट



नई सरकार में मेरा भी योगदान होगा

Tuesday, February 4, 2014

विडम्बना


मथा जो दोस्ती को तो नेह मलाई निकली 
किया बुरा तुमने जहाँ जहां वहाँ भी मेरी भलाई निकली 

हाथों  में मशालों वाले बेक़सूर थे जांच में 
आग बुझाने वालों की जेब से दियासलाई निकली

मैंने औरों से शिकायत करना छोड़ दिया जबसे 
रंगे हाथों जिसे पकड़ा वो मेरी ही परछाईं निकली

                                                        "नचिकेता "

Wednesday, January 1, 2014

नया साल


नया साल संग अपने एक उज्जवल दिनमान लाए
सुख शांति समृद्धि सम्पदा का नूतन पैगाम लाए
 हो विस्मृत काली यादें सब दफ़न भूत में हो जाएँ
जीवन का पुरुसार्थ सिद्ध हो कुछ ऐसे आयाम लाए।

सभी को नए साल की बधाई  और शुभकामना


                                                   -- नचिकेता

Thursday, April 12, 2012

मैथिली-१

 ये कुछ प्रश्न यू ही किसी के मन में उपजे हैं.
(अगले भाग में इन प्रश्नों के उत्तर मैथिली के मुख  से ही मिलेंगे.)

मैथिली-१ 
मैथिली-ओ-मैथिली! है क्यों विपिन जाना तुझे 
जानकी क्या दोष तेरा, जो विपिन जाना तुझे||

तृण बने जो तेरी सैय्या, फिर पलंग किस काम के
गर गुफा डेरा तुम्हारा, फिर भवन किस काम के
छोड़ छप्पन भोग-व्यंजन, कंद क्यों खाना तुझे
मैथिली-ओ-मैथिली! है क्यों विपिन जाना तुझे||१||

वाम-भागी राम की तू कुलवधू रघु-वंश की
धर्म-रत, पुत्री धरा की औ सुता मिथि-वंश की
तू है "आदि" फिर विशेषण कौन सा पाना तुझे
मैथिली-ओ-मैथिली! है क्यों विपिन जाना तुझे||२||

राम तो जाते हैं वन को, है हुकुम अवधेश की
"वन-गमन कर सुर-विजय हो"  विनती है देवेश की.
उर्मिला-लछमन पृथक, फिर संग क्यों आना तुझे
मैथिली-ओ-मैथिली! है क्यों विपिन जाना तुझे||३||

तू भी जाने है! प्रजा का तुझपे होगा रोष भी 
जांच मांगेगे तुझी से देंगे तुझको दोष भी
"बात ना मानी पिया की" देंगे ये ताना तुझे
मैथिली-ओ-मैथिली! है क्यों विपिन जाना तुझे||४||

  मैथिली-ओ-मैथिली! है क्यों विपिन जाना तुझे  
जानकी क्या दोष तेरा, जो विपिन जाना तुझे||
-- राजेश "नचिकेता" 


Wednesday, September 7, 2011

रामोदार का गुरुत्वाकर्षण का नियम

आज बैठे बैठे कुछ याद आया और काफी प्रासंगिक भी लगा तो सोचा कि आप सब को बताऊँ. कुछ साल पहले मैं एक बच्चे को विज्ञान पढ़ाने में मदद कर रहा था और उसे मैंने गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत के सन्दर्भ में समझाते हुए कहा "जब वैज्ञानिक न्यूटन ने पेड़ से सेब को नीचे गिरते देखा तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ और उसने गुरुत्वाकर्षण की खोज की." इतना कहते ही मेरे कानो में जो सुनाई दिया उसने मेरी तन्मयता को भंग कर दिया. किसी ने कहा "ईमे आस्चर्ज का कोन बात है जी. आ ई कोन बैगानिक है जिसको आस्चर्ज होता है जब गाछ से सेब निच्चे गिरता है. आस्चार्ज त तब न होना चाहिए जब ऊ गिरने के बाद उप्पर भाग जाय{1}" आपका अनुमान सही है अगर आप सोच रहे हैं कि ये वाक्य रामोदर के कंठ से निकले हैं. किताब ना पढ़ा जाय तो आदमी अपने अंतर्ज्ञान या यूं कहें कि सहज-ज्ञान के हिसाब से सोचता है और वही रामोदार ने किया भी. मैंने मुस्कुराते हुए रामोदार से कहा कि ऐसा होता है कि धरती सारी चीज़ों को गुरुत्व बल से अपनी ओर खींच के रखती है. अगर ऐसा ना हो तो चीज़े जमीन पे टिकी नहीं रह सकती. यूं तो मैंने अंतिम पंक्ति मैंने ऐसे ही समझाने के लिए कह दी थी लेकिन उसके उत्तर में जो रामोदार ने कहा उसे सुनकर आप भी स्तब्ध होकर सोच में पड़ जायेंगे जैसा कि मेरे साथ हुआ. उसने कहा "ओ!!!!!!! माने जब आदमी बडका अफसर बन जाता है चाहे बड़ा काबिल हो जाता है त उसका गुरत्ता बल कम हो जाता है अही लेके ऊ जो है जमीन पर नै टिकता है आ उरने लगता है{2}" पड़ गए ना सोच में. बात है ही सोचने वाली.

सफलता से आदमी में अहंकार नहीं आना चाहिए नहीं तो वो अपने जमीन पे टिके रहने की शक्ति खो देता है और उड़ने लगता है. इस तरह की क्षद्म-ऊर्जा युक्त उडती हुई चीज का गिरना तय है और समझने वाली बात है कि ज्यादा ऊंचाई से गिरने का अघात भी ज्यादा होता है. वसे तो सभी को चाहिए कि वो खुद को अहंकार से बचाए रखे लेकिन सफल आदमी के लिए ये ज्यादा जरूरी हो जाता. सफल व्यक्ति अगर विनम्र ना हो तो उससे दूर रहने की सलाह दी गयी है. "दुर्जनः परिहर्तव्यो विद्या अलंकृतोपिशं, मणिना भूषित सर्पः किमसौ ना भयंकरः" विनम्रता का आभाव किस हद तक घातक हो सकता है उसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि अवतारी पुरुष भी अविनाम्रता के दुष्परिणामों से नहीं बच पाए. ऐसा परशुराम अवतार की कथा में दृष्टिगोचर होता है. अपने क्रोध (या अविनाम्रता) के कारण भगवान परशुराम, जो कि स्वयं विष्णु के अवतार हैं, कभी भी जन-नायक नहीं हो पाए और यही परशुराम अवतार को रामावतार से भिन्न बनाता है. इसलिए सफल व्यक्ति को विनम्र होना चाहिए.

इन सारी चर्चाओं से परे होकर अगर सोचें तो ध्यान एक नए नियम की तरफ जाता है और उसे मैंने नाम दिया है रामोदार का गुरुत्वाकर्षण नियम: "सफलता के कारण गुरुत्वाकर्षण बल में कमी आती है और आदमी उड़ने लगता है." इस नियम के जितनी ज्यादा अपवाद मिलें समाज के लिए उतना ही अच्छा.

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1 इसमें आश्चर्य की कौन सी बात है. और ये कौन सा वैज्ञानिक है जिसे आश्चर्य होता है जब पेड़ से सेब नीचे गिरता है. आश्चर्य तो तब होना चाहिए जब वो गिरने के बाद ऊपर भाग जाय.
2 माने: मतलब
गुरत्ता: गुरुत्व
अही लेके: इसी कारण से
नै: नहीं
उरने: उड़

Sunday, August 14, 2011

आजादी और पंद्रह अगस्त

आजादी और पंद्रह अगस्त

सपने में देखी मैंने
एक
चौंसठ साल की वृद्धा
रात के अंतिम पहर में
खड़ी थी दिल्ली शहर में
दूर से देखा तो कमर झुकी थी
ऐसा आभाष हुआ
पास गया तो थोड़ा
विरोधाभाष हुआ
चेहरे पर झुर्रियों की
झड़ी लगी थी
मगर गहनों से लदी पड़ी थी
मुझे देख कर सहम गयी
और रही मौन
मैंने पूछा कौन?
इत्ती रात को क्या कर रही हो?
इतने जेवर डालकर
अँधेरे में कहा जा रही हो?
उसने कहा
मैं अँधेरे और अकेलेपन की आदि हूँ
क्योकि
मैं "आजादी" हूँ
जिसे होना चाहिए
लोगो के मन में
पर मैं बंद हूँ
संसद भवन में
हर अमीर, आज अपने में मस्त है
मध्यवर्ग, मंहगाई से पस्त है
हर गरीब, व्यवस्था से त्रस्त है
मुझे आज जेवर मिले हैं
क्योकि
आज पंद्रह अगस्त है
मैं रोती हूँ आततायिओं की
कारगुजारी पर
मैं जाती हूँ अब
मिलूंगी छब्बीस जनवरी पर.
स्वप्न टूटा तो
मैं खुद से कई प्रश्न कर रहा था
और उधर लाल-किले पर
जश्न मनाने का "दस्तूर" चल रहा था

सब छुट्टी में मस्त हैं

क्योकि आज पंद्रह अगस्त है


Tuesday, April 12, 2011

राम-जीवन:2


सभी लोगों को श्रीराम-नवमी की अनेकानेक शुभकामना......प्रस्तुत कविता पिछले भाग से आगे का हिस्सा है


पुराने भाग:
||*****|| राम-जीवन: भाग दो ||*****||

राजाओं में राजा था इक जिसका दशरथ नाम| धरम-धुरंधर रघुवंशी नित करते अच्छे काम
प्रजा सुखी थी वहाँ जहाँ का दशरथ राजा नेक| मित्र प्रेम करते थे उनसे डरते दुश्मन देख
रानी उनकी तीन-तीन थीं मगर पुत्र ना एक| पाने को संतान थे उसने किये उपाय अनेक
जब अनुकूल समय आया तो राजा ने ये सोचा| करूं यज्ञ और पाऊँ सुत जो करे वंश को ऊंचा
पुत्र के खातिर यज्ञ किया और पाया ऐसा वर में| चार चार बेटे खेलेंगे राजा तेरे घर में
पूर्व जनम में राजा को था दिया हरि ने दान
तेरा सुत बनकर आऊँगा, कहलाऊँगा राम |दोo-८
|

आये राम गर्भ में जबसे ऐसा हुआ प्रकाश| होगा अब कल्याण सभी का थी मन में ये आस
उस दिन अंतिम दिन था मेरे काले दुखी समय का| आनेवाले राम अवध में थे हरने दुःख सबका
चैत माह के शुक्ल पक्ष की नवीं तिथी की वेला| दिन के मध्य में आया वो जो था दुःख हरने वाला
धन्य गर्भ कौशल्या का और धन्य अवध की भूमि| स्वयं विष्णु ने आकर भर दी खाली गोदी सूनी
कहो भजूं मैं क्यों ना उनको जिनका ऐसा काम| छोटा बड़ा नहीं है कोई ऐसा कहते राम
ऐसी भाक्ती चाहता मैं नचिकेता दीन
राम मेरे पानी बने मैं बन जाऊं मीन |दो0-९|

शत्रुघन के साथ में भरत, लखन और राम| गुरु वशिष्ठ ने यूं रखा सब बच्चों का नाम
जो सबमे करता रमा वो कहलाया राम| सेवा औ अनुचर है उत्तम उसका लछिमन नाम
क्षण में शमन करे दुश्मन का है शत्रूघन वीर| पोषण करे जगत का देखो भरत धुरंधर धीर
चार वेद-से बेटे जिसको उसको क्या हो क्लेश| मेघ समय से वर्षा करते सुखी था पूरा देश
करने को कल्याण प्रभु का हुआ वहाँ अवतार| सब जन औ गौ जीव जंतु को मिला करेगा प्यार
जब होता संसार में कभी पाप-विस्तार
तज वैकुण्ठ आते हरी, ले मानव अवतार |दो-१०|

दुखी दीनों की सुन कर के, चले आये हैं राजा राम
स्थापित हो सके फिर से धरम, करने को ऐसे काम
धर्म-रत हो के ही उपयोग हो गर बाजूओं का बल
करम तेरे दिला देंगे तुझे भी राम का वो नाम |मुo-१|

पूरक ज्यूं रहते हैं नारायण और नर रहें वैसे नित संग राम और लछमन
धरती पे जब आये प्रभु धर नर देह, सब देव यहीं आके करते हैं कीरतन |कo-२|

क्रमशः.......

Tuesday, April 5, 2011

राम-जीवन:1



श्री गणेशाय नमः
एक छोटा सा प्रयास है श्री राम का नाम लेने का.....साहित्य के तौर पे त्रुटियाँ हो सकती हैं....उम्मीद है सुधी पाठक त्रुटियों की ओर इंगित कर के मेरी सहायता करेंगे.....सब को नवरात्र की शुभकामना....
||*****|| राम-जीवन: भाग एक ||*****||

भटक रहा था घोर शून्य में, एक जीव कुछ ऐसे| कर्म, भक्ति या अन्य मार्ग ले मोक्ष ढूँढता जैसे.
ब्रह्माण्ड में विचरण करता आया पास धरा के| देख अलौकिक रूप पृथ्वी का बोला शीश नवा के.
ये सुन्दर वायुमंडल और साथ में ऐसी काया| हरित, श्यामला तल और नीला नभ ये कैसे पाया.
बड़े प्रेम से धरती बोली जिसने मुझको रचा है| जो सर्जन करता है सबका ये भी उसका रचा है.
वही पोषण करता है सबका करता सबपे दया है| वही ब्रह्म है वही जीव है सब उसकी माया है.
सुनी धरा की बात जब हुआ जीव को भान
बोला माँ बतला दे मुझको कैसे मुक्त हों प्राण |दोo-१|

कई मार्ग हैं मुक्ति के जो लिखते वेद-पुराण| जप, तप, नियम, या भक्ती का हो चाहे प्रेम या ज्ञान.
जप, तप संयम कठिन अहो! है भक्ती आसान| करो करम तुम आपना रख मन में भगवान.
कलयुग में तो और भी सुलभ भक्ति का काम| करम-काण्ड को छोड़कर लेना है बस नाम
ग्रह नक्षत्रों से परे जिसका है आयाम| जपो नाम उस ब्रह्म का जिसका नाम है "राम"
वही कृष्ण है वही राम है और मीन, वामन है, परशुराम, कच्छप, वराह, वही नरसिंह और गौतम है
जिसके साँसों में बसे चार वेद सब ग्रन्थ
वही सृष्टि का आदि है वही सृष्टी का अंत|दोo-२|

आनंदित हो उठा जीव फिर सुन धरती की बात| जिज्ञासा पूरी करने को पूछी मन की बात
तेरी बातें याद दिलाती पूर्व जनम की बात| कथा सुनाते थे जब मुझको मेरे अपने तात
कहते थे वो, "राम" हुए थे त्रेता जुग में एक| भक्ति पाता भक्त उन्ही से डरता पापी देख
जीवन लीला उनकी सुनकर कट जाते हैं पाप| राम-कथा जो सुन ले कोई मिले ब्रह्म से आप
माता तेरी वाणी सुनकर आया मुझको ज्ञान| कह मुझको भी वही कहानी अपना बेटा जान
सागर है संसार यह और नाविक है प्राण
खेवानिहारा राम है, रामायण जल-यान|दोo-३|

कई जनम के पुण्य का मिलता है जब फल| राम नाम के साबुन से तब धुल जाता है मल
राम-कथा के स्वाद को बस उसने ही चक्खा| जिसने सारे दुर्गुण तज कर मन में राम को रक्खा
कथा सुनाऊंगी मैं तुम्हे जो है मुक्ति दायक| कहा धरा ने जीव से जाना जब इस लायक
तेरे भी सब पाप कटे अब है मुझको आभाष| शंका मन से दूर करो और श्रद्धा रखो पास
उमा ने शिव के मुख से पहले जो थी सुनी कहानी| वही कहानी अब मैं तुझको कहती हूँ ऐ प्राणी
रामायण के श्रवन को आ पहुंचे हनुमान
हुई कथा आरम्भ फिर ले गणपति का नाम|दोo-४|

राम कथा से पहले सुन ले थोड़ा सा इतिहास| लिया यहाँ अवतार किसलिए हुआ धरा पर वास
माँ असुरी, और मुनी जनक का पुत्र था एक बलवान| पाई उसने बहुत शक्तियां भज ब्रह्मा का नाम
राजा तो था लंका का पर स्वर्ग भी था आधीन| उसके ही संबंधी सारे पद पर थे आसीन
शास्त्रों का भी ज्ञाता था औ था रण का भी ज्ञान| लेकिन ज्ञानी होने पर भी था उसको अभिमान
अहंकार का दीमक जब भी लग जाता है जड़| मर जाती है सकल चेतना कर देती है जड़
भला बुरा कोई कैसे परखे गर हो मन में दंभ
ज्ञान का दर्पण निर्मल हो तो ही दिखता है बिम्ब|दोo-५|

वो अभिमानी बहुत बली था पा कर के वरदान| ऋषी पुलश्य का नाती वो था जिसका "रावण" नाम
नहीं मार सकता था कोई नर-वानर अतिरिक्त| ऐसा वर शंभू ने दिया था जब जाना निज-भक्त
वेद विदत सब कांडों को वो कहता था पाखण्ड| जो ले नाम हरि का उसको देता था वो दंड
त्राहि त्राहि सब सुर करते थे और धरा अकुलाय| दैत्य मगन थे सारे लेकिन दुखी विप्र और गाय
फिर मैं ऋषियों को संग लेकर गयी विष्णु के धाम| अपनी दासी जान के मुझको मिला अभय का दान
जा पृथ्वी तू निर्भय होकर लूंगा मैं अवतार
आततायियों का वध होगा साधू का उद्धार|दोo-६|

हरि की बातें सुनकर मुझको सुख पहुंचा अभिराम| मेरी पीड़ा हरने को अब आयेंगे श्रीराम
पलक झपकते देवों ने भी छोड़ दी अपनी काया| सेवा करने राम की सबने वानर रूप को पाया
करने लगी प्रतीक्षा मैं भी कब होगा अवतार| पापी का वध और शेष हों असुरी अत्याचार
उसी समय में अवधपुरी थी दशरथ की रजधानी| सभी सुखी थे वहाँ पे मैंने ऐसी सुनी कहानी
कहा प्रभु ने जन्म हमारा होगा वहीं अवध में| जहाँ सुधा सा निर्मल पानी बहता सरयू नद में
राम नाम संसार का कर देगा कल्याण
कलीकाल में खासकर जो भी लेगा नाम |दोo-७|

राम नाम भज नित ऐसा बोले वेद सब और ऋषी मुनी भी तो यही बस गाते हैं.
हर हरि नाम हरदम भजते हैं और नाम नारद भी नारायण का ही लेते हैं |कवित्त-१|

क्रमशः.........

Wednesday, March 23, 2011

नमन

देश के शान की खातिर अपने जान देने वाले शहीदों को आज के दिन शत-शत नमन.
भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को समर्पित पंक्तियाँ....

भगत ने प्राण देकर तब यहाँ दीपक जलाया था.
वो एक दीवाना था जिसने हमें रास्ता दिखाया था.
दिये को भी दिया तुमने था एक अंदाज़ जलने का.
निडर जीना निडर मरना यही सबको बताया था.

जय हिंद...
राजेश "नचिकेता"